यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते..." की बातें सिर्फ किताबों में अच्छी लगती हैं, जमीनी हकीकत तो यह है कि हमारी बेटियां घरों से बाहर कदम रखने में भी कतराती हैं। श्रीगंगानगर में 13 साल की बच्ची के साथ जो हुआ, उसे शब्दों में बयां करना भी मुमकिन नहीं है। 32 लोगों की हवस और समाज की अंधी आंखें!
हम हर बार मोमबत्तियां जलाते हैं, सोशल मीडिया पर रोष जताते हैं और फिर सो जाते हैं। धीमी न्यायिक प्रक्रिया और अपराधियों में कानून का खौफ न होना ही इस देश में हर घंटे 3 से 4 बेटियों की अस्मत लुटने की वजह है।
प्रशासन के बुलडोजर एक्शन का स्वागत है, लेकिन असली बुलडोजर उस सिस्टम और सोच पर चलना चाहिए जो महीनों तक इन मामलों को अदालतों में लटकाए रखती है। हमें न्याय सिर्फ 'जल्दी' नहीं, बल्कि 'नजीर' (Example) बनने वाला चाहिए।
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