Official Twitter handle of Office of Hon'ble Chief Minister, Uttarakhand.

Joined July 2019
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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड आधुनिक आधारभूत संरचना और बेहतर कनेक्टिविटी के साथ विकास की नई इबारत लिख रहा है। #Development #Infrastructure #Roadconnectivity #Nainital #Uttarakhand
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देवभूमि उत्तराखण्ड: सेवा, सुशासन, समर्पण- जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार। #Uttarakhand
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श्री गंगोत्री और श्री यमुनोत्री धाम तक बेहतर सड़क संपर्क, ऑलवेदर रोड परियोजना से यात्रा हुई सुरक्षित और सुविधाजनक। #Uttarkashi #Uttarakhand
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उत्तराखण्ड में हवाई सेवाओं का नेटवर्क हो रहा है लगातार मजबूत। #Pithoragarh #Uttarakhand
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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड में हवाई संपर्क को नई उड़ान मिल रही है। केंद्र की उड़ान योजना और राज्य सरकार के प्रयासों से दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्र अब आसमान से जुड़ रहे हैं। #Uttarakhand
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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सौग़ात चारधाम सड़क परियोजना का विस्तारीकरण मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल नेतृत्व में तेज़ी से हो रहा है। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा नदी पर लगभग 200 मीटर लंबे पुल और उससे जुड़ी 900 मीटर लंबी सुरंग का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। #Rudraprayag #Uttarakhand
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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड में आधारभूत संरचना विकास को नई गति मिली है। कोटद्वार विधानसभा क्षेत्र के कोटद्वार–किशनपुरी–चिल्लरखाल मार्ग पर तेली स्रोत नदी के ऊपर डबल लेन पुल जनता को समर्पित किया गया। #PauriGarhwal #Uttarakhand
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जन जन की सरकार,जन जन के द्वार: हर दिशा में विकास, हर राह पर विश्वास #Uttarakhand
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चम्पावत के बूमघाट में मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने जनपद की दो महत्वपूर्ण बाढ़ सुरक्षा परियोजनाओं का किया शिलान्यास।
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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने ₹29.65 करोड़ की लागत से निर्मित धनगढ़ी सेतु का किया लोकार्पण।
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टनकपुर से कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रथम दल को मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने हरी झंडी दिखाकर किया रवाना।
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देवभूमि उत्तराखण्ड: सेवा, सुशासन, समर्पण- जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार। #Uttarakhand
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"चम्पावत में कई महत्वपूर्ण कार्य कराए जा रहे हैं। ये केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि विकसित चम्पावत, सुरक्षित भविष्य और समृद्ध उत्तराखण्ड की मजबूत नींव हैं।" : मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी #Champawat #Uttarakhand
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"हमारी सरकार भ्रष्टाचार पर कोरी बात नहीं करती है, बल्कि भ्रष्टाचारियों पर सीधा प्रहार करती है।": मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी #Champawat #Uttarakhand
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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने आज राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-121 (नया राष्ट्रीय राजमार्ग-309) पर धनगढ़ी नाले के ऊपर ₹29.65 करोड़ की लागत से निर्मित 220.90 मीटर लंबे प्री-स्ट्रेस्ड गर्डर सेतु का लोकार्पण कर इसे जनता को समर्पित किया। यह राष्ट्रीय राजमार्ग काशीपुर-रामनगर-मार्चुला-बुवाखाल मार्ग पर स्थित है, जो कुमाऊँ एवं गढ़वाल मंडलों को जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। यह विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का प्रमुख प्रवेश द्वार होने के साथ-साथ नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चम्पावत तथा पौड़ी गढ़वाल सहित लाखों लोगों के दैनिक आवागमन, व्यापार, पर्यटन एवं आवश्यक सेवाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। धनगढ़ी नाले में बरसात के दौरान जलस्तर बढ़ जाने से मार्ग अकसर बाधित हो जाता था, जिससे आमजन, पर्यटकों तथा आपातकालीन सेवाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। नव निर्मित सेतु के निर्माण से इस समस्या का स्थायी समाधान हुआ है। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि धनगढ़ी सेतु का लोकार्पण केवल एक पुल का उद्घाटन नहीं, बल्कि क्षेत्रवासियों के वर्षों के संघर्ष, धैर्य और अपेक्षाओं की सार्थक परिणति है। बरसात के दौरान धनगढ़ी नाले में जलस्तर बढ़ने से मार्ग अवरुद्ध हो जाता था, जिससे जनजीवन, व्यापार, पर्यटन और आपातकालीन सेवाएं प्रभावित होती थीं। इसी समस्या के स्थायी समाधान के उद्देश्य से राज्य सरकार ने इस परियोजना को प्राथमिकता देते हुए समयबद्ध ढंग से पूरा कराया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि धनगढ़ी सेतु सम्पूर्ण उत्तराखण्ड का महत्वपूर्ण पुल है, जो कुमाऊँ एवं गढ़वाल मंडलों को सुदृढ़ रूप से जोड़ता है। इस सेतु के निर्माण से दोनों मंडलों के बीच आवागमन अधिक सुरक्षित एवं सुगम होगा तथा पर्यटन, व्यापार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने "सेवा, सुशासन और विकास" के पाँच वर्ष पूर्ण करते हुए प्रदेश के प्रत्येक क्षेत्र तक विकास पहुँचाने का कार्य किया है। सरकार की प्राथमिकता अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचाना है। इसी सोच के अनुरूप राज्य में आधुनिक सड़कें, मजबूत पुल, विस्तृत रेल नेटवर्क, रोपवे, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन तथा सीमांत क्षेत्रों के विकास सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऐतिहासिक कार्य किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार की कार्यसंस्कृति "सरलीकरण, समाधान, निस्तारण एवं संतुष्टि" पर आधारित है। इसी के अनुरूप जिन योजनाओं का शिलान्यास किया जाता है, उनका समयबद्ध ढंग से निर्माण पूर्ण कर लोकार्पण भी सुनिश्चित किया जाता है, ताकि जनता को शीघ्र लाभ मिल सके। उन्होंने बताया कि धनगढ़ी सेतु के निकट लगभग ₹18.43 करोड़ की लागत से निर्मित 175.60 मीटर लंबे पनौद पुल का निर्माण कार्य भी लगभग पूर्ण हो चुका है। वर्तमान में इस पुल पर यातायात संचालित हो रहा है तथा डामरीकरण का अंतिम कार्य शीघ्र पूर्ण कर इसे भी जनता को समर्पित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि धनगढ़ी और पनौद पुल इस पूरे क्षेत्र के विकास की मजबूत आधारशिला सिद्ध होंगे। मुख्यमंत्री ने रामनगर क्षेत्र के वन खत्तों में निवासरत परिवारों की समस्याओं पर भी उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी अवगत कराया कि रामनगर-रानीखेत मोटर मार्ग सहित अन्य महत्वपूर्ण मोटर मार्गों के चौड़ीकरण हेतु सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारत सरकार में प्रस्ताव प्रेषित किए जा चुके हैं तथा आवश्यक कार्यवाही प्रगति पर है। इस अवसर पर केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री श्री अजय टम्टा ने कहा कि धनगढ़ी सेतु के निर्माण से वर्षभर सुरक्षित एवं निर्बाध यातायात सुनिश्चित होगा। मुख्यमंत्री ने गर्जिया देवी मंदिर में पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की। इसके उपरांत उन्होंने नव निर्मित धनगढ़ी सेतु का पैदल भ्रमण किया तथा कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की सीमा पर पुल के समीप आए वन्यजीवों का भी अवलोकन किया। इस अवसर पर विधायक रामनगर श्री दीवान सिंह बिष्ट, विधायक सल्ट श्री महेश जीना, विधायक रानीखेत श्री प्रमोद नैनवाल, भाजपा जिलाध्यक्ष श्री प्रताप बिष्ट, दायित्वधारी श्री शंकर कोरंगा, श्री संजय डॉर्बी, श्री जेड. ए. वारसी, श्री गणेश रावत, श्री रंजन बरगली सहित अन्य जनप्रतिनिधि, डीएम नैनीताल श्री ललित मोहन रयाल, एसएसपी डॉ. मंजूनाथ टी.सी., सीडीओ श्री अरविन्द कुमार पाण्डेय, अधीक्षण अभियंता (राष्ट्रीय राजमार्ग) श्री मनोहर सिंह धर्मशक्तू तथा बड़ी संख्या में क्षेत्रीय नागरिक उपस्थित रहे।
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"यदि नीयत साफ होती है, नीति अच्छी होती है, काम करने की भावना होती है, मन में जनता के लिए दर्द होता है, तो विकास के काम धरातल पर उतरते हैं।" : मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी #Champawat #Uttarakhand
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भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री के तौर पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कार्यकाल एक ऐसे राजनेता की छवि पेश करता है, जिनके विकास का दृष्टिकोण बहुत व्यापक और मानवीय था। उन्होंने उद्योग को नव स्वतंत्र राष्ट्र में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित करने का साधन माना। वे धन सृजन और मूल्य संवर्धन का सम्मान करते थे। दामोदर घाटी निगम, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और एक मजबूत औद्योगिक नीति जैसी महत्वपूर्ण पहलों के माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की आधारशिला रखते हुए, उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत की पारंपरिक खूबियों की अनदेखी न हो। हथकरघा, कुटीर उद्योगों, कारीगरों और वस्त्र मज़दूरों को डॉ. मुखर्जी के रूप में एक ऐसा समर्थक मिला, जो उनके लिए पूरी तरह समर्पित था। यहाँ, मैं एक व्यक्तिगत अनुभव साझा करना चाहूँगा। सिंदरी संयंत्र, जिसे डॉ. मुखर्जी ने आत्मनिर्भरता की स्पष्ट दृष्टि के साथ स्थापित किया था, को उन लोगों ने नजरअंदाज किया, जो कई दशकों तक राष्ट्र चला रहे थे। मुझे गर्व महसूस होता है कि हमारी सरकार को इसके पुनरुद्धार में योगदान देने का अवसर मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थिति, वास्तव में मेरे लिए सबसे खास पलों में से एक थी। भारत की सभ्यतागत परंपरा में लंबे समय से संवाद और चर्चा को महत्त्व दिया गया है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के प्रतीक थे। वे पंडित नेहरू की कैबिनेट में शामिल हुए, क्योंकि उनका मानना था कि शुरुआती वर्षों में राष्ट्र-निर्माण का काम राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर था। उन्होंने ईमानदारी और रचनात्मक भावना के साथ सेवा की। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के लिए अलग रास्ते की ज़रूरत है, तो उन्होंने सम्मान के साथ अपना पद त्याग दिया और पूरी तरह से उस राजनीतिक काम के लिए समर्पित हो गए, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे। 75 साल पहले, पंडित नेहरू पहला संशोधन लाए थे, जो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला था। डॉ. मुखर्जी इसके कट्टर आलोचकों में से एक थे। वे अच्छी तरह समझते थे कि कांग्रेस क्या कर सकती है और वे सही साबित हुए। जिन लोगों ने 75 साल पहले पहला संशोधन किया था, उन्होंने ही 1975 में आपातकाल लगाया और 50 साल पहले 42वां संशोधन अधिनियम लेकर आये, जिसने एक बार फिर उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव पर चोट की। डॉ. मुखर्जी मानवतावादी कार्यों के लिए भी जाने जाते थे। जब 1943 में बंगाल में सबसे भयंकर अकाल पड़ा, डॉ. मुखर्जी प्रभावित लोगों की सेवा में पूरी तरह जुट गए। उन्होंने लोगों को खाना खिलाने के लिए कई कैंटीन और राहत केंद्र खुलवाए। एक तरफ, वे अपने लोगों की हालत देखकर बहुत दुखी थे, तो दूसरी तरफ, औपनिवेशिक शासकों की संवेदनहीनता ने उन्हें झकझोर दिया। उन्होंने एक किताब भी लिखी, 'पंचासेर मन्वंतर', जिसमें उन्होंने अपना आक्रोश व्यक्त किया। जब 1942 में मेदिनीपुर में ज़बरदस्त चक्रवात आया, तो हालात को सामान्य करने में उनकी कोशिशों की व्यापक रूप से सराहना हुई। कोलकाता के एक कॉलेज के अपने संबोधन में डॉ. मुखर्जी ने युवाओं से आग्रह किया, "आप जो भी काम करें, उसे गंभीरता से, पूरी तरह से और अच्छी तरह से करें; इसे कभी भी आधा-अधूरा या बिना किये न छोड़ें, जब तक आप इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ न दे दें, तब तक खुद को संतुष्ट महसूस न करें।" जैसे-जैसे भारत विकसित भारत के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहा है, हम उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि इस रूप में दे सकते हैं कि हम मजबूत, एकजुट, आत्मविश्वासी और सहानुभूतिपूर्ण भारत के निर्माण के लिए हर दिन प्रयास करें, जिसमें वे बहुत गहराई से विश्वास करते थे। और आज के युवाओं को समझते हुए, मुझे यकीन है कि वे इस अवसर पर आगे आएंगे और बिल्कुल वैसा ही प्रयास करेंगे। (श्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री)
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आज, 6 जुलाई, उन अनगिनत लोगों के लिए एक विशेष दिन है, जो देशभक्ति और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों को मानते हैं। हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहे हैं, जिनका जीवन साहस और माँ भारती के प्रति अटूट समर्पण का एक कालातीत उदाहरण है। आधुनिक भारत में ऐसे बहुत कम नेता हुए हैं, जिनमें बुद्धि, जनसेवा और नैतिक दृढ़ता का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला हो। युवा श्यामा प्रसाद का जन्म ऐसे परिवेश में हुआ था, जहाँ उन्हें आसानी से एक सुरक्षित और आरामदायक जीवन मिल सकता था। उनके पिता, सर आशुतोष मुखर्जी, अपने समय के प्रमुख शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों में से एक थे। भाग्य ने उन्हें सुख-सुविधाओं का मार्ग दिखाया, इसके बावजूद, उनकी अंतरात्मा ने उन्हें त्याग और राष्ट्र-सेवा के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। उन्हें पक्का यकीन था कि वे अपने समय की उथल-पुथल भरी परिस्थिति में मूकदर्शक बने नहीं रह सकते, चाहे वह उपनिवेशवाद, सांप्रदायिकता या मानवीय चुनौतियों के खिलाफ लड़ाई ही क्यों न हो। इस यात्रा में उन्होंने गहरी व्यक्तिगत त्रासदियों का सामना किया, जिसमें एक शिशु और बाद में उनकी पत्नी की मौत शामिल है। तथापि, इन त्रासदियों ने केवल उनके संकल्प को और सुदृढ़ किया तथा सेवा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को मजबूत किया। अगर कोई एक आदर्श था, जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन को सबसे ज्यादा परिभाषित करता था, तो वह था भारत की अखंडता। विभाजन के उथल-पुथल भरे दौर में वे मजबूती से डटे रहे और सुनिश्चित किया कि पश्चिम बंगाल भारत का एक अभिन्न अंग बना रहे। कुछ साल बाद, यही विश्वास उन्हें जम्मू और कश्मीर की ओर ले गया। कारावास ने उन्हें हतोत्साहित नहीं किया और अलगाव ने उन्हें कमजोर नहीं किया। उनका जीवन हिरासत में अचानक समाप्त हो गया, उन अनगिनत लोगों से दूर - जिनकी पीड़ा को उन्होंने अपना उद्देश्य बनाया था। इतिहास में ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का अंतिम बलिदान राजनीति से परे जाकर राष्ट्रीय स्मृति में शामिल हो जाता है। डॉ. मुखर्जी की अंतिम यात्रा भी ऐसा ही एक पल रही। आचार्य विनोबा भावे ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने उस मकसद के लिए खुद को बलिदान कर दिया, जिसमें उन्हें विश्वास था। सालों बाद, 2019 में अनुच्छेद 370 और 35(A) को रद्द करना उनकी शहादत के प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि थी। डॉ. मुखर्जी ने भारत और भारतीय मूल्यों को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने ऐसे संस्थान बनाए और ऐसी प्रणालियाँ विकसित कीं, जो उस समय की पारंपरिक सोच को चुनौती देती थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। अपने विशिष्ट अंदाज़ में, उन्होंने ऐसे सकारात्मक बदलाव किए, जो देशभक्तिपूर्ण और भविष्योन्मुखी थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए, डॉ. मुखर्जी ने बहुत अच्छे तरीके से इस बात को व्यक्त किया: "शैक्षिक संस्थानों को केवल लिपिक और कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियों के रूप में देखना गलत है। हमें ऐसे छात्र तैयार करने होंगे, जो हमारे स्व-शासी संस्थानों - जैसे नगर निगम, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिका - का नेतृत्व कर सकें और साथ ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रों - जैसे वित्तीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक - में कामकाज का संचालन कर सकें।" उनके नेतृत्व में, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने अनूठे प्रयास किए, जैसे पुस्तकालय अवसंरचना में सुधार करना, विज्ञान में शोध को बढ़ावा देना, कलाकृतियों के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि में पाठ्यक्रम स्थापित करना, आदि। उन्होंने खेल, शिक्षक प्रशिक्षण और छात्र कल्याण जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया। छात्रों और पूर्व छात्रों में गर्व की भावना जगाने के लिए, उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के तौर पर मनाने की शुरुआत की। उन्होंने स्वयं गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत की रचना करने का आग्रह किया। उनकी इस भावना का एक अन्य उदाहरण, उनके जीवन के बाद के दौर में देखने को मिलता है, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का फैसला किया। एक ऐसे समय, जब कांग्रेस पार्टी का हर जगह बोलबाला था, उन्हें लगा कि भारत की प्रगति के लिए एक ऐसे वैकल्पिक आवाज बनाने के कारण मौजूद हैं, जो हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हो। शायद यह उचित ही था कि पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दीया’ - मिटटी का दीपक - रखा गया। एक छोटा सा दीपक साधारण लग सकता है, लेकिन इसमें इतनी ताकत होती है कि यह अपने से बहुत दूर तक अंधकार को दूर कर सकता है। जनसंघ ने भी ठीक यही काम किया—चाहे उनके सक्रिय रहने के दौरान हो या उसके बाद हो।
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हरिद्वार में शुरू हुआ जनपद का पहला मॉडल टीकाकरण केंद्र, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मिलेंगी आधुनिक एवं बेहतर सुविधाएं। #Vaccination #Haridwar #Uttarakhand
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उत्तराखण्ड सरकार की पिरूल नीति, वनाग्नि पर रोकथाम के साथ ही रोजगार के अवसर भी हुए सृजित। #Forest #Forestfire #Champawat #Uttarakhand
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