Day 22/60: कालाशोक और द्वितीय बौद्ध संगीति
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शिशुनाग के बाद मगध की गद्दी पर बैठा उसका पुत्र 'कालाशोक', जिसे इतिहास में 'काकवर्ण' (कौए जैसा काला) भी कहा गया है। उसने मगध के इतिहास को एक नई सांस्कृतिक दिशा दी। स्वागत है
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कालाशोक ने पहला बड़ा काम यह किया कि उसने मगध की राजधानी को हमेशा के लिए राजगीर या वैशाली से बदलकर 'पाटलिपुत्र' स्थानांतरित कर दिया। अब पाटलिपुत्र भारत की राजनीति का मुख्य केंद्र बनने जा रहा था। 🏢
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कालाशोक के शासनकाल की सबसे बड़ी घटना थी—बुद्ध के महापरिनिर्वाण के ठीक 100 साल बाद वैशाली में 'द्वितीय बौद्ध संगीति' (Second Buddhist Council) का आयोजन। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के बीच के मतभेदों को सुलझाने का प्रयास किया गया। ☸️
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इसी संगीति के दौरान बौद्ध संघ पहली बार दो वैचारिक गुटों में बंट गया—स्थाविर और महासांघिक, जो आगे चलकर महायान और हीनयान बौद्ध धर्म का आधार बने।
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लेकिन कालाशोक का अंत बेहद दर्दनाक और अप्रत्याशित था। पाटलिपुत्र के महल के पास टहलते समय किसी ने उसकी गर्दन में खंजर घोंप दिया। यह हत्यारा कौन था? कल Day 23 में सामने आएगा भारत का पहला 'एकराट' सम्राट!
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